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सिंहासन... इसे भोगने वाले ही चले गए

                
                                                         
                            महाभारत युद्ध के बाद...,
                                                                 
                            
सम्राट अशोक की तरह,
युधिष्ठिर विचलित हो गए।
वो सोचने लगे.... ?
खून से लथपथ मृत सैनिक,
गुरु द्रोण, अभिमन्यु और घटोत्कच,
सब के सब मृत पड़े हैं।
हमारे प्रिय पिता मह भीष्म,
बाणों की शैया पर कष्ट में पड़े हैं।
क्या है यह सब...?
चारों तरफ अपने ही अपने पड़े हैं।
युधिष्ठिर गर्दन झुकाए सर पर हाथ रखे,
कह रहे हैं - हाय विधाता यह क्या हो गया?
श्री कृष्ण आए और बोले -
बड़े भैया... आपकी आंखों में आंसू,
हां माधव...! अपनों को खोकर क्या मिला?
सिंहासन... इसे भोगने वाले ही चले गए,
हम जीतकर भी हार गए,
वो आज मेरे सामने पड़े हैं।
श्री कृष्ण बोले - बड़े भैया...!
वक्त की नियति है,
इनका साथ यहीं तक था,
इनकी चाहत इतनी बढ़ गई थी ,
कि इनको तुम अपनों की चिंता ही नहीं थी,
ये तो हश्र होना ही था,
जब नौबत युद्ध तक पहुंची,
तो ये अपने नहीं दुश्मन से भी बढ़कर थे,
इसलिए तो ये यहां पड़े हैं।
बड़े भैया उठो...!
सुबह तुम्हारा इंतजार कर रही है।
-चंद्र दत्त शर्मा
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एक घंटा पहले

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