क्या टूटता था दिल ?
जब ननिहाल से आते थे।
यादें ही रह गई हैं शेष,
जून की छुट्टियों का इंतजार रहता था,
बड़े चाव से जाते थे,
अब ऐसा वक्त कहां ?
जाने की फुरसत नहीं है,
पिछली यादें ताजा हो गईं,
जितने दिन भी रहते थे,
वो भी दिन कम पड़ जाते थे।
-चंद्र दत्त शर्मा
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