जगमगा उठा चांद में तेरा चेहरा,
एक बार फिर से आ जाऊं,
बाँधकर... मैं सेहरा !
चांद में भी आज बात है कुछ और,
चांद के सामने आया चांद, करो गौर।
सज संवरकर आई जब गौरी,
कौन से चांद की करूँ चोरी ?
एक चांद करे दूसरे चांद का इंतजार,
कौन सुंदर है किसी को नहीं एतबार?
-चंद्र दत्त शर्मा
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