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तरु पर सजाते आशियाना अपना

                
                                                         
                            बेख़ौफ़ जमाने से
                                                                 
                            
पिंजरे से आजाद
स्वच्छंद नीड़ निर्माण के
तानों बानों में रत
अपने चमन के सरताज
ये प्यारे परिन्दे
ये न्यारे परिन्दे
शिकवो शिकायतो से परे
ऊँची उड़ान की मस्ती में
झूमते लहराते परों से
गगन में करते अठखेलियां
बहती बयार के बन संगी
बातें करते और
खेलते आँख मिचौली
झुंड में उड़कर
आसमान में रचते चित्रकारी
लगती रंगों भरी रंगोली
इनकी अपनी बोली
इनकी अपनी भाषा
तरु पर सजाते आशियाना अपना
कलरव से चहकाते जहां अपना
अपनी ही दुनिया में मगन
मीठा बोलो मीठा गाओ
जियो और जीने दो
देते यही पैगाम
-पूनम खत्री
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53 मिनट पहले

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