हिंदी हमारी जान है,
हमारे राष्ट्र की शान है।
जन-जन के लबों पर बसने वाली,
हमारी अभिव्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान है।
माँ सरस्वती की वाणी है हिंदी,
क्रांतिकारियों की कहानी है हिंदी।
गाँव-शहर, खेत-खलिहान की,
पगडंडियों की निशानी है हिंदी।
हिंदी की भाषिक परंपरा,
की कहानी बहुत पुरानी है।
संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश से,
विकसित इसकी रवानी है।
ब्राह्मी ने इसे आकार दिया,
नागरी ने इसे निखार दिया।
देवनागरी में ढलकर हिंदी ने,
अपना रूप सँवार लिया।
कभी गंगा की पावन धारा बन,
गाती है हिंदी।
तो कभी हिमालय-सी अटल,
विश्वास जगाती है हिंदी।
कभी हमारी रफ़्तार का आग़ाज़ बन,
क्रांति को लाती है हिंदी।
तो कभी हमारी आवाज़ को,
अल्फ़ाज़ों से सजाती है हिंदी।
किसी कवि की कविता में,
बसती है हिंदी।
तो किसी चलचित्र की पटकथा को,
रचती है हिंदी।
माँ की ममता,
जगाती है हिंदी।
पिता का वात्सल्य,
लुटाती है हिंदी।
हिंदी सिर्फ़ एक भाषा ही नहीं,
हमारी पहचान है हिंदी।
अपनी सरलता और शुद्धता के कारण ही,
हमारे साहित्य की जान है हिंदी।
कर्तव्य हमारा बनता है,
हिंदी को समृद्ध बनाएँ।
अपने व्यवहार और लेखन से,
हिंदी का मान बढ़ाएँ।
हिंदी का मान बढ़ाएँ।
— नूतन झाl
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