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आँसुओं को बदलते देखा है

                
                                                         
                            आँसुओं को मैंने बदलते देखा है,
                                                                 
                            
कभी खुशी तो कभी ग़म में ढलते देखा है।

कभी पर्वत की ऊँचाइयों को छूते देखा है,
तो कभी समुद्र की गहराइयों में उतरते देखा है।

आँसुओं को मैंने बदलते देखा है।

ममता बनकर कभी अपने आँचल में छिपाते देखा है,
तो कभी करुणा का सागर बनकर मन का बोझ मिटाते देखा है।

आँसुओं को मैंने बदलते देखा है।

कभी अपनों की याद दिलाते देखा है,
तो कभी बिछड़ने का ग़म जताते देखा है।

आँसुओं को मैंने बदलते देखा है।

और जब शब्द साथ छोड़ दें,
तब हमारी आवाज़ बनकर बोलना सिखाते देखा है।

आँसुओं को मैंने बदलते देखा है।

कभी हमारे दर्द बनकर आँखों से निकलते देखा है,
तो कभी हमारी खुशी बनकर पलकों पर सजते देखा है।

आँसुओं को मैंने बदलते देखा है।

कभी वर्षों बाद मिली खुशी पर नम होते देखा है,
तो कभी आँखों में ठहर जाते देखा है।

आँसुओं को मैंने बदलते देखा है।

बादल की बूँद बनकर कभी मन की धरा पर बरसते देखा है,
तो कभी नई उम्मीद बनकर अंतर का बोझ हल्का करते देखा है।

आँसुओं को मैंने बदलते देखा है,
कभी खुशी तो कभी ग़म में ढलते देखा है।
— नूतन झा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 minutes ago

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