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विकल मन से कुछ भी ना कहो!

                
                                                         
                            क्या होगा उसको ज्ञान सिखाकर?
                                                                 
                            
जैसे रिक्त कक्ष में प्रकाश जलाकर,
वो जैसा है उसको वैसा ही रहने दो,
विकल मन से कुछ भी ना कहो।

उसकी बात पल्ले नहीं पड़ी तो,
तुम्हारी बुद्धि अथक प्रयास कर कर के थक गई हो तो,
इस निष्फल प्रयास को अब जाने भी दो,
विकल मन से कुछ भी ना कहो।

रिक्त रथ को सारथी व्यर्थ हांके जैसे,
बांझ – बंजर भूमि पर किसी ने बीज बो दिए हों जैसे,
ये मन तुम्हारी एक ना सुनेगा, तुम भी इसकी मत सुनो,
विकल मन से कुछ भी ना कहो।

मन, बुद्धि, अहंकार– कुछ भी नहीं है तुम्हारे बस में,
फिर क्यूं डूबे हो तुम ऐसे मिथ्या अभिमान के रस में?
तुम्हारा मन यदि तुम्हारी सच्चाई दिखाए भी तो नेत्र बंद कर लो,
विकल मन से कुछ भी ना कहो।
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4 वर्ष पहले

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