दो नावों में पाँव पसारे,
कैसे जाओगे गाँव दुलारे?
एक पाँव में शहर टिका हो,
एक पाँव से गाँव दुलारे?
है भीड़ जहाँ पतले गलियारे,
रात के ओझल धुंधले तारे,
अजनबी बने हैं बैठे सारे,
कैसे जाओगे गाँव दुलारे?
शाम जहाँ हो उजले न्यारे,
काम के पीछे पड़े हैं सारे,
इसे कहते हो मजबूरी न्यारे?
पर असल हो मजदूरी के मारे।
सूरज उगता जहाँ देर से न्यारे,
न बेल हो बस बिजली के तारे,
हो खेत ना हो चौड़ी क्यारे,
और बने रहे अवसाद के मारे।
इसलिए
अब शहर की भाग दौड़ छोड़ दो,
एक पाँव में शहर एक में गाँव ,
तुम यह संतुलन तोड़ दो।।
-निशांत
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