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कविता

                
                                                         
                            कैसा राहगीर था वो
                                                                 
                            
मिले उससे तो होश खो गए।
देखते ही उसे मौसम ने अंगड़ाई ली।
अभी पतझड़ नहीं आया।
फिर भी सारे पत्ते झड़ गए।
जिस गाड़ी पर सफर करना था।
वो छूट गया।
उस राहगीर के साथ ना जाने
किस गाड़ी पर चढ़ गए।।

- निर्मला सिन्हा 'निशा'
ग्राम जामरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़
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2 वर्ष पहले

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