आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कविता

                
                                                         
                            एक बार फिर कण-कण को
                                                                 
                            
शिव - शंकर हो जाने दो।
नेत्र तीसरा खुल जाने दो,
प्रलयंकर हो जाने दो ,
एक बार फिर महादेव को
बम बम भोले हो जाने दो।
पांचाली के काले केशों की
सौगंध फिर एक बार खा लेने दो।
दु:शासन के कौरव का हो विनाश,
हमारे पांडवों को फिर आ जाने दो।
धमनियों में रक्त उबाल खा रही,
देखो चंडिका जीभ अपनी लपलपा रही,
है शांत अगर इसे है,करना भ्रष्टाचार
कौरवों की मुंडमाला बना
इसके गले में तुम पहनाने दो।
एक बार फिर कण-कण को शिव
शंकर हो जाने दो।।

कवयित्री निर्मला सिन्हा 'निशा'
ग्राम जामरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर