एक बार फिर कण-कण को
शिव - शंकर हो जाने दो।
नेत्र तीसरा खुल जाने दो,
प्रलयंकर हो जाने दो ,
एक बार फिर महादेव को
बम बम भोले हो जाने दो।
पांचाली के काले केशों की
सौगंध फिर एक बार खा लेने दो।
दु:शासन के कौरव का हो विनाश,
हमारे पांडवों को फिर आ जाने दो।
धमनियों में रक्त उबाल खा रही,
देखो चंडिका जीभ अपनी लपलपा रही,
है शांत अगर इसे है,करना भ्रष्टाचार
कौरवों की मुंडमाला बना
इसके गले में तुम पहनाने दो।
एक बार फिर कण-कण को शिव
शंकर हो जाने दो।।
कवयित्री निर्मला सिन्हा 'निशा'
ग्राम जामरी डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़
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