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गुसलखाना

                
                                                         
                            गुसलखाना
                                                                 
                            

स्त्री कपड़े ही नहीं धोती गुसलख़ाने में
वह धो डालती है
सारे ग़म, सारी तकलीफें
कपड़े नहीं निचोड़ती
दम लगाकर निचोड़ती है
अपने अंदर की कुंठा को
ताकि मन को शांत कर सके
बाल्टी में कपड़ो के साथ
दबा देती हैं अपने अंदर
अंगड़ाइयां लेती ख्वाहिशों को
पीठे से जोर -जोर से पीटती है
चद्दरों के बीच रख अपने मन को
ताकि उसे हर परिस्थिति में ढाल सके
मेल के साथ निकाल फेकती है
अपने मन का क्षोभ, आक्रोश
नल के बहते पानी में बहा आती हैं
अपने सतरंगी ख्वाब
धड़धड़ गिरते पानी की आवाज़ में
मिला लेती है अपना रुदन
ताकि कोई सुन न पाए उसकी सिसकियां
दम लगाकर गिसती है कपड़ों पर साबुन
असल में वह साबुन नहीं गिसती
गिसती है अपने हाथ की भाग्य रेखाएँ
रगड़ -रगड़कर धोती है
बुशर्ट के कालर में अपना स्वाभिमान
जिस पर लगे हैं अपमान के कई दाग
सब कुछ बहा आती है
गुसलखाने के पानी में
एक- एक कपड़े के साथ झटककर
सुखा देती हैं अपने हसीन अरमान
शांत, क्लांत और निर्मल होकर
जीने लगती है वह
रोजमर्रा का बनावटी जीवन

- डॉ. निर्मला 'नीलोफर'
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2 वर्ष पहले

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