बजने दे नारी शक्ति का डंका
इतिहास बदल देगी कलयुग का
जा पुरुष बैसाखी तुम स्वर्ग धीर
लोटा दो मान सम्मान नारी शक्ति की जागीर ।
नारी बजायेगी राजनीतिक का डंका
निरीक्षण करेगी बनाएगी धरा को कंचन का
नारी है लक्ष्मी दुर्गा चंडी मनी कनिका
इस धारा में न बनने देगी कभी रावण का लंका।
नहीं चाहिए नारी को वीर हनुमान
नहीं चाहिए पुरुषोत्तम राम
नहीं सह सकेगी सीता सी अपमान
धधक रही है सीने में अपनी अपमान।
हम हैं आज का दुर्गा चंडी
जो टेकेगा मेरा पगडंडी
ना देखेंगे समय ना करेंगे इंतजार
पल भर में करेंगे सर धड़ से अलग
अपनी शक्ति की धार।
नारी शक्ति की डर से
थरथर कांपेंगे दुराचारी
ना होगी सृष्टि में कोई तय खाना
ना होगी कोई जेल
खत्म करेगी दुराचारी की पल भर में खेल।
स्वर्ग से सुंदर धरती होगी अपना
ना रणभूमि होगी
ना रणभेरी बजेगी
ना होगा कोई सम्राट
नारी शक्ति होगी विराट ।
नई कलियां पुष्पित होगी
नई पराग नहीं मधुर लेकर विकसित होगी
स्वतंत्र बगिया में भरेगी किलकारियां
ना होगी हिजाब की हिसाब किताब
ना कोई घुंघट की करेगा बात
नारी शक्ति करेगी धरा पर राज।
यहां कोई नारी नहीं होगी लचार
ना कोई पनपेगा यहां दुर्योधन
ना बनेगी कोई पंचाली
ना कोई पद्मावती करेगी जोहर
नारी शक्ति बनेगी हवस के निभाचरों के लिए अभिशाप।
हम नारी है भरे पूरे
नहीं चाहिए हमें पुरुषों की छत्रछाया
हम नहीं बनेंगे पुरुषों की साया
जा पुरुष वैशाखी तुम स्वर्ग धीर
सोप दो मुझे सृष्टि का बागडोर
बजने दे नारी शक्ति का डंका
कभी ना बनेगी यहां रावण का लंका।॥
(रेखा भारती - निर्मल ठाकुर )
(बनासो हजारीबाग झारखंड )
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