एक शहीद के समर की आत्मकथा।
सीमा पर चली थी एक दिन वो, अंधाधुंध गोलियाँ।
और
गुंज उठी थी वो। भारत माता के जय की बोलिया।
माँ हमने तो दुश्मनों पर सौ सौ गोलियाँ चलाई थी।
पर मेरे हिस्से में तो बस माँ एक ही गोली आई थी।
वो गोली
भी माँ मैने पीठ पर नहीं अपने सीने में खाई थी।
माँ उस दिन मुझे
ये अहसास हुआ कि, तू सारी रात नहीं सोई थी।
अरे उस दिन तो वो
गोली भी मेरे सीने में उतरने से पहले घबराई थी।
माँ,
हम मरते तो नहीं है बस हम तुमसे जुदा हो गए।
मातृभूमि पे
शहीद होके, हम इस दुनिया से ही विदा हो गए।
बस,
आई थी गहरी नींद, हम गहरी नींद में खो गए।
अरे! खाकर एक
गोली सीने में हम भारत माँ की गोद में सो गए।
भारत माँ का कर्ज तो, मैं चुका सका।
पर, माँ मै तेरा कर्ज़ तो चुका न सका।
फिर, घर वापस तो मै आ न सका।
पर। माफ़ करना ए माँ,
मुझे तोफ़ का गोला भी झुका न सका।
सूरज तो कहता है,
मै तो, हमेशा उदय और अस्त होता हूँ।
पर अब मेरा आखिरी प्रणाम ले माँ, मै
तुमसे आज चिरस्थाई रुखसत होता हूँ।
नेमाराम - बरना
(कलम बोलती है।)
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