गुरू से बड़ा ज्ञानी हो चला है चेलों का जमघट।
नौकरीयां फटाफट,रुपये भी खातों मे खटाखट।
वो हार हार कर थक चुका पर जीत नहीं मिली,
जीत का आख़िरी नुस्खा होता है , तख्ता पलट।
ये तक़्सीम,ये अफ़रा-तफ़री ,और ये 'अरब स्प्रिंग',
उनके सपनों मे 'अरब विंटर',जुबां पर बोधि वट।
पेरिस और मिलान में सफ़ल है उन्माद के प्रयोग,
पर खौफ़ के हक़ मे हरगिज़ नही यहां संख्या पट।
हवा मे उड़ रहे थे परिंदें अपनी माटी को दुत्कारते,
फंस गये पिंजरे मे अब लगा रहे आज़ादी की रट।
-जयंत दिक्षित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X