आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अंतर्वस्त्र ही चिथड़ा-चिथड़ा है।

                
                                                         
                            देखो वो जो अपनी जिद पर अड़ा है।
                                                                 
                            
सुपर पावर नही, बस एक हिजड़ा है।
धर्म,जाती,भाषा,याभाई-भतीजावाद,
लगता है बशरियत से ज्यादा बड़ा है।
खुराफाती शीर्षासन बता रहे है उसे,
एक आदमी जो सिर के बल खड़ा है।
तुम्हारे नारों मे रोटी देख ली गरीब ने,
तुम्हें जीताने ,गुरबत का वोट पड़ा है।
एक बकरा, एक बोतल और गणिका,
कार्यालय जलेबी,अफसर फाफड़ा है।
संविधान मिला सूट बुट मे और बोला,
मेरा तो अंतर्वस्त्र ही चिथड़ा-चिथड़ा है।
- जयंत दिक्षित 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर