ग़ज़ल
पंछियों सी चहचहाती है सहर।
शोख ग़ुल सी खिलखिलाती है सहर।।
ओट से पर्वत के आती है सहर।
झील में डुबकी लगाती है सहर।।
हर तरफ दिखता है इक उल्लास सा
होश भी मन में जगाती है सहर।।
आरती का थाल लेकर हाथ में।
साथ मेरे गुनगुनाती है सहर।।
नींद का उन्माद मिटता है यहीं।
रंग जीवन के दिखाती है सहर।।
नाज़नीनें आ गईं गागर लिए।
पनघटों पर मुस्कुराती है सहर।।
चाॅंदनी को है बहुत खुद पे गुरूर।
रोज ही उसको मिटाती है सहर।।
नीलम सिंह
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