कविता मुझसे चिपकी रहती है,
कोई कविता बने तो जाने।
कविता कहती है मुझसे—
मैं तुमसे प्रेम करती हूँ।
कोई मेरे जैसा प्रेम तुम्हें करे,
तो जान जाना कि वो तुम्हारी है।
कविता कहती है, लोग बदल जाते हैं,
लेकिन प्रेम नहीं बदलता।
प्रेम वही रहता है।
अगर प्रेम भी बदल जाए,
तो प्रेम, प्रेम नहीं रहता।
वह किसी स्वार्थ से उत्पन्न हुआ था,
उसका मतलब पूरा हो गया,
वो खत्म हो गया।
प्रेम तुमसे बिल्कुल चिपका रहेगा,
जिसकी ख़ुशबू हर वक़्त तुम्हें मिलती रहेगी।
प्रेम एक ख़ुशबू है,
प्रेम तुम्हारे जीवन का सहारा बनेगा,
जैसे कविता मेरे जीवन का सहारा है।
मैं अपनी कविता से प्रेम करता हूँ,
कविता भी मुझसे अब प्रेम करने लगी,
तभी तो अच्छी-अच्छी कविताएँ मुझसे बन जाती हैं।
उस प्रेम में डूबकर कोई कविता बने,
तो जानूँ।
तो उसे अपना मानूँ,
मैं कविता का हूँ,
कविता मेरी।
कविता के प्रेम में डूबा हुआ आशिक,
कविता मेरी कहानी,
सुनाऊँ लोगों को अपनी ज़ुबानी।
मेरी कविता आए मेरे पास—
ये कहानी सुन कर ।
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