आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सबकी ईद होनी चाहिए

                
                                                         
                            हयात सबकी एक जैसी है तो सबको मुफ़ीद होनी चाहिए
                                                                 
                            
रात सब की एकसी है तो मयस्सर सबको नींद होनी चाहिए

क्यूँ कोई नाउम्मीद रह कर उम्र - ए - तमाम चला जाता है
एक जैसी ज़िन्दगी में सब के एक जैसी उम्मीद होनी चाहिए

बे-शक दीन धर्म जात मज़हब रखते रहें लोग जुदा - जुदा
खुदा सबका एक होलीदिवाली और सबकी ईद होनी चाहिए

© डॉ. एन. आर. कस्वाँ 'बशर' bashar بشر
गुलिस्तान-ए-अदब gulistaan-e-adab گلستانِ ادب
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर