बहुत छोटी है बाहर की राह ए सफ़र
लम्बी है बड़ी मग़र अंदर की रहगुज़र
हो चुकी है बाहर की इन्तेहा ए सफ़र
कर अपने भीतर की इब्तिदा ए सफ़र
- डॉ. एन. आर. कस्वाँ
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