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माँ मुझे फिर रोक लेगी

                
                                                         
                            माँ मुझे फिर रोक लेगी
                                                                 
                            
दौलत की ऊँची दीवारों में, हमने खुद को बाँध लिया,
इस दुनिया के झूठे छल को, सचमुच अपना मान लिया।
जीत लिया यह जग सारा, पर भीतर से खुद को मार दिया,
माँ का आँचल छूट गया तो, सब कुछ हमने हार दिया।
दुपहरी जेठ की जलती, हवा में वो पतंगें थीं,
हमारे छोटे सीनों में, हज़ारों ही उमंगें थीं।
गला जब सूख जाता था, पसीने छूट जाते थे,
मगर हम भूल कर भी, घर की चौखट तक न जाते थे।
तभी चौखट से आँगन में, पुकार इक गूँज जाती थी,
मेरी ममतामयी माँ, पास अपने यों बुलाती थी—
"ओ मेरे लाल! आ कर घूंट दो पानी के पी ले तू,
झुलसती धूप है बाहर, ज़रा सी छाँव जी ले तू!"
मगर सूखे लबों पे जीभ हम बस फेर लेते थे,
तड़पती प्यास को हम खेल में ही मार देते थे।
हमें मालूम था, घर गए तो खेल छूट जाएगा,
अगर भीतर कदम रखा तो, हुक्म आ ही जाएगा—
कि पानी पीने मैं गया तो, वो मुझे फिर टोक देगी,
मुझे पक्का पता था, माँ मुझे फिर रोक लेगी!
लुका-छिपी के खेलों में, गली-कूचे सुहाते थे,
मगर छुपने को अपने घर, कभी हम जा न पाते थे।
उछल कर गेंद जो कभी, हमारे घर में जाती थी,
उसे वापस ले आने में, बड़ी घबराहट आती थी।
दबे पाँवों से जाते थे, कि आहट माँ न पा जाए,
नज़र पड़ते ही उसकी, खेल सारा छूट ना जाए—
कि गेंद लेने गया तो, वो मेरा रस्ता रोक लेगी,
मुझे पक्का पता था, माँ मुझे फिर रोक लेगी!
ज़माना बीतने पर आज, मुझको याद आता है,
वो उसका डांटना भी, प्यार का इक गीत गाता है।
मुझे महफूज़ रखने को, वो खुद से बांधती थी माँ,
मेरी खातिर दुआएं, उम्र भर ही मांगती थी माँ।
मगर अब वक़्त की आंधी, मुझे किस मोड़ ले आई?
मिली शोहरत मुझे लेकिन, मिली गहरी है तन्हाई।
नहीं कोई भी अब पीछे से, मुझको यों बुलाता है,
थके-हारे से माथे को, न आँचल में सुलाता है।
मैं जलता हूँ मगर मुझको, बचाने कौन आता है?
मेरी सूखी हुई इस प्यास को, अब कौन बुझाता है?
कहाँ वो खेल का मैदान, चौखट पीछे छूट गई,
कहाँ वो रूठना मेरा, कहाँ वो ममता रूठ गई?
भ्रमों में सोचता हूँ आज भी, वो मुझको टोक लेगी,
कि भीतर मैं गया तो, माँ मुझे फिर से रोक लेगी!
खड़ा हूँ आज चौखट पे, मैं आँखों में नमी भर के,
बहुत थक सा गया हूँ मैं, ज़माने का सफ़र करके।
तरसता हूँ कि फिर से, गूँज वो कानों में आ जाए,
"मेरे बेटे! तू पानी पी ले", ये आवाज़ छा जाए।
कसम है माँ मुझे तेरी, बहाना अब न करूँगा,
तेरी चौखट पे गिरकर मैं, तेरा आँचल पकड़ लूँगा।
गिलास दोनों ही हाथों से, पकड़ कर पानी पी लूँगा,
मैं तेरा दर्द सारा, आज अपने हिस्से ले लूँगा।
मैं घर से बाहर जाने की, ज़िद अब ना करूँगा माँ!
मैं तेरे पास ही रह कर, हमेशा अब जिऊँगा माँ!
ऐ काश! सूनी चौखट से, आवाज़ फिर वो गूंज जाए,
मैं पानी पीने जाऊँ... और वो रस्ता मेरा रोक ले,
हाँ माँ! काश इस बार तू... मुझे हमेशा के लिए रोक ले!
-नितिन शर्मा
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2 घंटे पहले

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