आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हिन्दी भाषा का प्रचार का नशा हैं।

                
                                                         
                            महज एक तारीख नहीं हैं,
                                                                 
                            
हमारी संस्कृति की पहचान हैं।
जन जन की आवाज है,
भारत मां की शान हैं।

खेत खलिहानों की भाषा हैं,
बाजारों की आशा हैं।
भारतीय संविधान की परिभाषा हैं,
हिन्दी भाषा का प्रचार का नशा हैं।

युगों- युगों की विरासत हैं,
अनेकों आत्माओं की इबादत हैं।
भारतीयों गीतों की नफासत है,
विकसित भारत की इमारत हैं।

विदेशों में हमारा स्वाभिमान हैं,
सरकारी कार्यलय का सम्मान हैं।
राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनाने का,
करोड़ो भारतीयों का अरमान है।

भारतीय समाज का सरस हैं,
सीमाओं से परे इसकी गूंज हैं।
हमारी धरोहर की पुंज है,
महज एक दिवस नहीं हैं।
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
36 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर