प्रतीक्षा - एक मुलायम डोर
प्रतीक्षा
क्षण-क्षण पल हर पल
मुलाकात, उस एक मुलाक़ात की
डर कर हट गये कितने
फिर भी ,
आयेगा वह
निश्छल, निस्वार्थ बाॅंहे फैलाये खड़ा
योद्धा वहीं कहलायेगा
विलीन होने को तैयार चिरनिद्रा में।
प्रतीक्षा
क्षण-क्षण पल हर पल
मुलाकात उस एक मुलाक़ात की
आयेगा वह
निश्छल, निस्वार्थ बाॅंहे फैलाये खड़ा
आभारी हूॅं
सीखाया सोना काॅंटो पर
फूलों की शैय्या ले गया कपट से
कृतज्ञ हूॅं सिर्फ तुम्हारा
छीन कर आह भी
बिठला दिया चौराहे पर
देखने और समझने के लिए
मुकरियाॅं रास्ते के
और कहा, हाथ बढ़ा कर पकड़ ले
डोर एक मुलायम , कहलाती है प्रतीक्षा।
प्रतीक्षा
क्षण-क्षण पल हर पल।
नाग मणि
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