चहकती चिड़िया की आवाजें आती है मेरे गाँव में,
भोर की पहली किरण नज़र आती है मेरे गाँव में,
कहीं झुंड में खड़ी - बैठी बतियाती हुई पनघट के पास,
कहीं कतार दिख जाती है पणिहारिन की मेरे गाँव में।
गायों, भैंसों के झुंड , भेड़ - बकरियों के रेवड़ ,
कहीं कंधे पर हल लिए किसान दिख जाते मेरे गाँव में,
कहीं सूत के कपड़े में बंधा साग - रोटी का कलेवा लिए,
खेत की पगडंडी पर काकी - दादी दिख जाती मेरे गाँव में।
कहीं चूल्हे की रोटी पर चटनी,और मक्की की राबड़ी,
चंदा की चांदनी में साथ जीमता परिवार मेरे गाँव में।
सांझ ढले बस्ती की चौपाल ,दादी के गीत दादा की बात,
होली की रात और चंग की थाप दिख जाती है मेरे गाँव में।
वो बारिश का मौसम,और नदी - तालाब का किनारा ,
पौष-माघ की ठिठुरन और कुलथ की घूघरी मेरे गाँव में।
जेठ मास की तपती दुपहरी में माटी की मटकी का पानी,
पेड़ की छांव में बना बिछौना,दिख जाता मेरे गाँव में।
लगता है शहर में भीड़ में भी हर कोई अकेला सा होता है,
यहाँ अकेले में भी अपनों का शहर दिख जाता मेरे गाँव में।
कहीं उजले कपड़ों के पीछे भी छिपा है मेल दरिंदगी का,
सभ्यता सादगी की असली सुगंध बहती है मेरे गाँव में।
मोहन लाल रेगर , अध्यापक
देवरिया, देवगढ़, जिला - राजसमन्द
मो. 9929401701
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