वह आम आदमी है—न भाषणों में उसका नाम,
न अख़बारों की सुर्खियों में,
बस मेहनत उसका परिचय,
और पसीना उसका मुकाम।
वह सड़क बनाता है,
शहर सजाता है,
दूसरों के घरों में रोशनी करता है,
और अपने घर लौटकर बिजली का बिल देखता है।
वह देश की अर्थव्यवस्था का
एक छोटा-सा हिस्सा कहलाता है,
पर जब बाज़ार बदलता है,
सबसे पहले वही हिल जाता है।
उसकी इच्छाएँ बहुत बड़ी नहीं—
दो वक्त की रोटी,
बच्चों की अच्छी शिक्षा,माँ की दवा,
और घर में थोड़ा सुकून।
मगर इन छोटी-छोटी चीज़ों तक
पहुँचने में उम्र बीत जाती है।
फिर भी वह चलता रहता है—
क्योंकि उसके कंधों पर
सिर्फ़ अपना नहीं,
पूरे परिवार का भविष्य होता है।
वह आम आदमी है—
कम बोलता है,बहुत सहता है,
और इसी सहने की आदत में
कभी-कभी अपना होना भूल जाता है।
महँगाई शोर नहीं करती,
वह धीरे-धीरे आती है,
पहले थाली छोटी करती है,
फिर इच्छाएँ घटाती है।
पहले बच्चे दूध माँगते थे,
अब पानी से बहल जाते हैं,
पहले सपने महँगे थे केवल,
अब सपने भी टल जाते हैं।
पहले माँ कहती थी—“फल ले आ,”
अब कहती है—“रहने देना,”
घर की औरत सीख गई शायद
कम में ही सब कुछ कर लेना।
बाप पुराने जूते पहनकर
बच्चों को नए दिलाता है,
अपनी हर छोटी-सी चाहत को
चुपचाप पीछे हटाता है।
महँगाई का सबसे गहरा दुख
दाम बढ़ना भर नहीं होता,
जब कोई पिता बच्चों की इच्छा
पूरी न कर पाए—वह क्षण बड़ा होता।
और फिर भी सुबह वही आदमी
काम की ओर निकल जाता है,
क्योंकि उसके टूटने से पहले
पूरा घर टूट जाता है।
प्याज़ के दाम बढ़े तो
आँखें केवल प्याज़ ने नहीं रुलाईं,
रसोई के खाली डिब्बों ने भी
घर की मजबूरी सुनाई।
चीनी महँगी हुई तो बच्चे बोले—
“चाय में मिठास कम क्यों है?”
माँ ने मुस्काकर बात टाल दी—
“आज सेहत का मौसम है।”
मुनीर शमी
अण्डाल
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