नुमाइश की चीज़ हैं हम!
गर हमारे अंदर भी एक ज़माना होता...
तो शायद मुक़द्दर में सिर्फ़ तवाफ़ नहीं,
अपनी पहचान का एक मुकम्मल अफ़साना होता।
ज़माने ने हमारे चेहरे का नूर देखा,
मगर रूह पर लिखी सदियों की पीड़ा नहीं पढ़ी।
महफ़िलों में हमारी वाहवाही हुई,
मगर उन ख़ामोश रातों की सिसकियाँ किसी ने नहीं सुनी।
हम वो चिराग़ थे,
जो दूसरों की महफ़िलों को रोशन करते रहे,
मगर अपनी ही रोशनी के लिए अंधेरों से लड़ते रहे।
हीरामंडी की हर गली में एक दास्तान थी—
कहीं अधूरी मोहब्बत थी,
कहीं टूटे हुए ख़्वाब थे,
और कहीं अपने वजूद को पाने की जद्दोजहद थी।
मल्लिकाजान की आँखों में सिर्फ़ सियासत नहीं,
एक औरत के संघर्ष की पूरी कहानी थी।
बिब्बोजान की मोहब्बत में सिर्फ़ इश्क़ नहीं,
अपने उसूलों के लिए लड़ने की हिम्मत थी।
आलमज़ेब के ख़्वाबों में सिर्फ़ नया आसमान नहीं,
अपनी पहचान चुनने की आज़ादी थी।
और ताजदार की मोहब्बत में सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं,
उस हिंदुस्तान की उम्मीद थी,
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