कोचिंग की नगरी में बचपन की तलाश
कंधों पर बस्ता भारी है,
आँखों में इक लाचारी है।
सपनों की लंबी गलियों में,
बचपन की राहें हारी हैं।
सुबह किताबों संग जागे,
रात सवालों में सो जाए।
जिस उम्र में मैदान बुलाएँ,
वो टेस्टों में खुद खो जाए।
न बारिश में भीगने का मन,
न पतंगों की उड़ान बची।
अंकों की ऊँची दीवारों में,
मासूमी की पहचान बची?
होर्डिंग पर मुस्काते चेहरे,
सफलता के गीत सुनाते हैं।
पर कितने टूटे अरमानों को,
ये आँकड़े कब बतलाते हैं?
घर से दूर किसी कमरे में,
चुपचाप बहुत कुछ सहता है।
माँ की ममता, पिता का साया,
यादों में ही अब रहता है।
रैंक अगर अच्छी आ जाए,
तो दुनिया सर पर चढ़ जाती।
थोड़ी सी ठोकर क्या लग जाए,
उम्मीदें भी बिखर जातीं।
बच्चा कोई मशीन नहीं है,
जिसको बस दौड़ाया जाए।
उसके मन की कोमल धरती पर,
थोड़ा सा प्रेम उगाया जाए।
खेल भी हों, उत्सव भी हों,
जीवन का संगीत भी हो।
सपनों की ऊँची उड़ानों संग,
बचपन का मनमीत भी हो।
आओ ऐसी राह बनाएँ,
जहाँ सफलता भी मुस्काए।
और किसी कोचिंग नगरी में,
बचपन फिर से लौट के आए।
क्योंकि अंकों से आगे बढ़कर,
जीवन का विस्तार बहुत है।
एक बच्चे की मुस्कान में ही,
भविष्य का संसार बहुत है।॥
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