हे नारी
एक चोट लग जाये अगर आत्मसम्मान को ,
तो वहीं रुक जाना हे नारी तुम के अपने अस्तित्व पर,
आंच की एक बूँद भी नहीं सहना तुम ,
हो अगर तुम्हारी गलती तो नतमस्तक भी हो जाना तुम ,
जो न हो तुम्हारी एक भी गलती तो अपनी रक्षक खुद बन जाना तुम,
मान पर आये आंच तुम्हारे तो सर को काटने तक का जज़्बा रखना तुम,
ईश्वर के लिये तुम फूल हो तो शैतानों के लिए कांटा भी बन जाना तुम,
माँ के ममता सी कोमलता लिये पर विपत्ति पर पत्थर सी अडिग रहना तुम,
हो अगर न साथ तुम्हें किसीका अकेले लड़ लेना तुम खुद की पहचान को खुद ही बचाना तुम..||
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