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मानवता

                
                                                         
                            हे, कलुकाल के मानव !
                                                                 
                            
तु मानवता में श्रेष्ठ है,
तु दानवता में श्रेष्ठ है।
जो तु मन में लाता है,
करने से ना कतराता है।

तूने सिंधु को पार किया,
अचल गिरी को तार किया।
क्षण में अंबर को माप ले,
तु पृथ्वी को भी नाप ले।

पर स्वयं को कभी खंगाला है ?
लोभ, काम और तृष्णा में तूने दानव को पाला है।
जब यह दानव उठ जाता है ,
तेरा मानव मर जाता है।

तुझ मृत मानव, जागृत दानव की बुद्धि मात्र कल्पित है,
तेरे द्वारा कलुकाल में दुष्कर्म बड़े फलित हैं।
चोरी, हिंसा, यौन उत्पीड़न कुछ तूने न बक्शा है,
तेरे द्वारा क्या संभव इस संसार की रक्षा है?

हां, संभव है यह रक्षा जो तू श्याम बनेगा,
द्वापर में पल-भर में आने वाला घनश्याम बनेगा।
ना हो केवल नर-नारी भाव,
गजराज, शिखंडी भी समभाव।
करुणा, दया और नैतिकता को जो तू अपनाएगा।
तेरे मन का दानव स्वत ही मर जाएगा।
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एक वर्ष पहले

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