आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दर्द सीने में लिए ग़म-ख़्वार तक आया हूँ मैं,

                
                                                         
                            दर्द सीने में लिए ग़म-ख़्वार तक आया हूँ मैं,
                                                                 
                            
मुद्दतों के बा'द कू-ए-यार तक आया हूँ मैं ।

थक गया जब रोज़-ओ-शब की धूप में जलते हुए,
ढूँढता साया तेरी दीवार तक आया हूँ मैं ।

जिस की आँखों में चमकता था कभी चेहरा मिरा,
अश्क बन कर अब उसी रुख़्सार तक आया हूँ मैं।

नज़्र करने को नहीं कुछ मेरी इस जाँ के सिवा,
सर झुकाए अब तिरे दरबार तक आया हूँ मैं।

ख़्वाहिशों का क़त्ल करके, मुश्किलों को रौंद कर,
ज़िंदगी के अब नए किरदार तक आया हूँ मैं।

कश्तियाँ टूटीं मिरी तूफ़ान की यलग़ार में,
मौज से लड़ता हुआ मँझधार तक आया हूँ मैं।

इस जुनून-ए-शौक़ पर आख़िर इनायत हो गई,
''आते-आते आस्ताने-यार तक आया हूँ मैं"।

वक़्त के हर ज़ुल्म को हँस कर सहा है ऐ 'रज़ा',
सर हथेली पर लिए अब दार तक आया हूँ मैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर