दर्द सीने में लिए ग़म-ख़्वार तक आया हूँ मैं,
मुद्दतों के बा'द कू-ए-यार तक आया हूँ मैं ।
थक गया जब रोज़-ओ-शब की धूप में जलते हुए,
ढूँढता साया तेरी दीवार तक आया हूँ मैं ।
जिस की आँखों में चमकता था कभी चेहरा मिरा,
अश्क बन कर अब उसी रुख़्सार तक आया हूँ मैं।
नज़्र करने को नहीं कुछ मेरी इस जाँ के सिवा,
सर झुकाए अब तिरे दरबार तक आया हूँ मैं।
ख़्वाहिशों का क़त्ल करके, मुश्किलों को रौंद कर,
ज़िंदगी के अब नए किरदार तक आया हूँ मैं।
कश्तियाँ टूटीं मिरी तूफ़ान की यलग़ार में,
मौज से लड़ता हुआ मँझधार तक आया हूँ मैं।
इस जुनून-ए-शौक़ पर आख़िर इनायत हो गई,
''आते-आते आस्ताने-यार तक आया हूँ मैं"।
वक़्त के हर ज़ुल्म को हँस कर सहा है ऐ 'रज़ा',
सर हथेली पर लिए अब दार तक आया हूँ मैं।
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