कुछ लब्ज़ जुबां पर
आज भी ठहरें हुए हैं
कुछ ज़ख्म मरहम से मिलकर
और गहरे हुए हैं
लम्हें जो बीत चुके याद बनकर,
वो आज की ज़मीं पर
टूटकर बिखरे हुए हैं
क्यों रुसवा हैं तन्हाई?
तन्हाई की पनाह में ही
तो मुद्दतें महफूज़ है हमारी
क्या ख़्वाब लेकर सजदे में झुके हम?
मन में तो बसी है बस तस्वीर तुम्हारी
कुछ लब्ज़ ज़रा ग़मगीन हैं
किसी अधूरी बात से लिपटकर
वो बात जिसका ज़िक्र सिर्फ यादों में हैं
जो मौन है बहुत कुछ कहकर
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X