मुझपर तेरे दुआओं का
सेहरा बंधा था।
किसी बद्दुआओं से
मुझको डर कहाँ था?
बेशक...बेशक तू आज
मेरी दुनिया में नही है...
मगर , मेरे हर सांस में
तू अब भी हुआ करती है।
मैं उदास होऊं,
या दिल से मुस्कुराऊँ
माँ...तू सदा मेरे
आस -पास हुआ करती है।
तुझसे सुंदर अब तक मैने
कोई रचना नही देखा
बहुत देखा कृति ईश्वर की
मगर...माँ जैसा दूजा नही देखा।
कहाँ बांध पाती हूँ , मैं
तुझको शब्दों की सीमा-रेखा में
अनन्त, अथाह,अपरिमित... मां
तुझको मेरा शत-शत नमन है ।
मीना गोपाल त्रिपाठी
कोतमा, अनुपपुर(मध्यप्रदेश)
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