आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

माँ से सुंदर अब तक मैंने...

                
                                                         
                            मुझपर तेरे दुआओं का
                                                                 
                            
सेहरा बंधा था।
किसी बद्दुआओं से
मुझको डर कहाँ था?
बेशक...बेशक तू आज
मेरी दुनिया में नही है...
मगर , मेरे हर सांस में
तू अब भी हुआ करती है।
मैं उदास होऊं,
या दिल से मुस्कुराऊँ
माँ...तू सदा मेरे
आस -पास हुआ करती है।
तुझसे सुंदर अब तक मैने
कोई रचना नही देखा
बहुत देखा कृति ईश्वर की
मगर...माँ जैसा दूजा नही देखा।
कहाँ बांध पाती हूँ , मैं
तुझको शब्दों की सीमा-रेखा में
अनन्त, अथाह,अपरिमित... मां
तुझको मेरा शत-शत नमन है ।

मीना गोपाल त्रिपाठी
कोतमा, अनुपपुर(मध्यप्रदेश)
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर