रोज़ लगाता हूँ ईंट कोई
रोज़ मेरा यकीन ढह जाता है
उम्मेद की मिट्टी मेरी दीवार से
जाने कौन चुरा ले जाता है
कोई तो कमी है मेरी ख्वाहिशों के मकान में
कैसे वरना रोज़ इनका वजूद ढह जाता है
जितना भी छुपाऊँ उम्मीद को धूप से
कोई लम्हा दबेंपाँव रोज़ जला ही जाता है
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