अपने किरदार पे वो गौर कभी करते नहीं
मेरे किरदार पे बोहतान लगाने वाले
अपनी फितरत का तमाशा ही करेंगे आखिर
मुझको नीचा यहाँ महफिल में दिखाने वाले
जिनकी आँखों में खटकता है उजाला मेरा
मेरे साये से भी डरते हैं डराने वाले
वक्त की गर्द में खुद अपनी जगह ढूँढेंगे
नाम मेरा यहाँ दुनिया से मिटाने वाले
सिर्फ लफ्जों से मोहब्बत का जो दम भरते हैं
काम आते नहीं ये रस्म निभाने वाले
अपनी ज़द में ये खुद अपनी ही हवा लाएंगे
खाक हो जाएंगे ये दिल को जलाने वाले
खौफ सूरज का अंधेरों से नहीं मिट सकता
हार मानेंगे ये सच्चाई छुपाने वाले
सच तो आलम की ज़बाँ बोलेगी हर हाल यहाँ
थक के सो जाएंगे सब शोर मचाने वाले
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