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दफ़्तर की भागदौड़ और गांव

                
                                                         
                            दफ़्तर ने दिन रख लिया, सफ़र ने रख ली शाम,
                                                                 
                            
दुनिया की इस भागदौड़ में, कहाँ मिला आराम।

रात ने बस इतना पूछा—आज अपने लिए क्या जिया?
मैंने घड़ी देखी चुपके से, अगली सुबह का अलार्म भर दिया ।

सुबह हुई तो फिर वही जल्दी, वही रास्ते, वही काम,
चेहरे पर मुस्कान रखी, दिल में दबा लिया आराम।

कमाने की इस दौड़ में जाने क्या-क्या हार गए,
अपनों के बीच रहते हुए भी, अपनों से दूर हो गए।

बचपन की वो गलियाँ याद आईं, वो पीपल की ठंडी छाँव,
माँ की आवाज़, पिता का साया, और अपना प्यारा गाँव।

वो मिट्टी की सोंधी खुशबू, वो आँगन की शाम,
बिन कहे हाल पूछ लेते थे, जहाँ अपने तमाम।

माना कि साँसें उधारी की हैं, ऐ-मान,
फिर दो जून की रोटी के लिए क्यों इतना परेशान?

उम्र यूँ ही फ़ाइलों में पूरी न हो जाए,
ज़िंदगी सिर्फ़ कमाने में कहीं अधूरी न रह जाए।

कुछ पल बच्चों के संग, कुछ माँ-बाप के नाम,
कुछ अपने लिए भी रख लें—बस इतना सा है अरमान।

बहुत दौड़ लिए शहर में, अब थोड़ा ठहर जाएँ,
जिस मिट्टी ने हमें बनाया, उसी मिट्टी में लौट आएँ।

चलो अब अपने लिए भी थोड़ा जिया जाए,
शहर की भीड़ से निकलकर गाँव की ओर चला जाए।

जहाँ शामें सुकून दें, सुबहें उम्मीद जगाएँ,
जहाँ रिश्ते आवाज़ से नहीं, आँखों से समझ जाएँ।

कुछ दिन ज़िंदगी को ज़िंदगी की तरह जिया जाए,
सब्र कर ऐ दिल… अब गाँव की ओर रुख किया जाए।
— मान सिंह कश्यप
 
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42 minutes ago

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