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जो न पढ़ सका तू कभी

                
                                                         
                            लफ्ज नहीं जो कह सकूं , अल्फ़ाज़ है जो तुम पढ़ सको
                                                                 
                            
धड़कने भी खामोश है खामोशी जो तुम पढ़ सको
लिख सकूं न मैं जो हिस्सा है तू वो मेरा
है सुकून तू बेचैनियों का मेरे

है बची एक खामोशी पास मेरे जो न तुम पढ़ सके
आओगे जब मुझसे मिलने , है क्यों ये उदासी बताएंगे हम तुम्हे
अब तो रहती है हर दम है ये तन्हाई पास मेरे
तू तो नहीं है पास मेरे , एक याद तेरी जो रह गई

अब न आना मुझसे मिलने , मैं भी तन्हा हूं सही
था तुझको कितना पुकारा , तू तो सनम था दूर कहीं
दिल भी चाहे है चाहे यही , तू न आना पास कभी
है बची एक उदासी , जो न पढ़ सका तू कभी ॥

 
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6 घंटे पहले

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