हे जगतनियंता!तुम कितने निष्ठुर हो!!
कोपाग्नि की ज्वाला में
सबके सब जल जाएंगे
जल तांडव की लहरों में
सबके सब बह जाएंगे
अगर चाहोगे , मानव जाति का
अस्तित्व ही मिट जाएगा
जीवन विहीन धरती होगी
मिट्टी मिट्टी ही रह जाएगा
ये सब तुम तो जानते हो, फिर भी,
हे जगतनियंता!तुम कितने निष्ठुर हो!!
जल ,अग्नि,मिट्टी, आकाश,
पवन दिशाएं तुम्हारा है
पर मानव की तन मन की
पीड़ा अंबार तुम्हारा है
जल प्रलय ने डूबो दिए
जिनके घर ,मंदिर ,परिवार
भला ,उनका अपराध क्या है
बिना वक्त छोड़े संसार
ये सब तो तुम जानते हो, फिर भी
हे जगतनियंता! तुम कितने निष्ठुर हो!!
मासमों की दर्दनाक
मौत, क्या तुमको नहीं दिखा
क्या आंखें नहीं छलकी
कठोर मन नहीं पसीजा
इतना विभत्स दृश्य देखकर
क्या, द्रवित न हुआ हृदय
नव सृष्टि की ईच्छा हो तो
फिर से कर दो महप्रलय
ये सब तो तुम जानते हो, फिर भी
हे जगतनियंता! तुम कितने निष्ठुर हो!!
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