झील में खिली खिली, नीलकमल हो,
सच कहूं तो तुम किसी, शायर की गजल हो,
सूरज की स्वर्ण किरण हो, दमकती चांद हो,
अगहन की ठंडी रात की,दहकती अनल हो।
परम पुनीत पुष्प हो, पारिजात की
बनाई गई कुदरत की शीशमहल हो।
तारों की सभी सोखियां, पलकों में सजाई,
जन्नत की खूबसूरत, परियों की नकल हो,
फ़ुरसत से बनाया तुम्हें परवर - दिगार ने
सौंदर्य मूर्ति हो, खुदा की फ़ज़ल हो।।
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