खामोशी की खुशबू कांटों का मंजर खोल रहे हैं,
तरुणाई के ज्वार में, सागर के अंतस बोल रहें हैं।
मचा हुआ है हल्ला गुल्ला संसद के गलियारों में,
सड़कों पर आवाज वही, नया रास्ता खोल रहें हैं।
संविधान को धता बताकर कुर्सी पर जो बैठें हैं,
गंगा जमुनी संगम में ,जहर बदी का घोल रहें हैं।
देशभक्ति के नारों में बस सिंहासन का होड़ है,
राजनीति के पांव के नीचे,जर्रे जर्रे डोल रहें हैं।
कब तक होगी माँ सीता की अग्निपरीक्षा और वनवास,
रामराज्य की कल्पना के सारे आसन डोल रहें हैं।
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