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फूल सा मन

                
                                                         
                            फूल सा मन है मेरा न तोड़ो इसे
                                                                 
                            
पंखुड़ी की तरह मैं बिखर जाऊंगा
न खुशबू रहेगी न रंगीनियाँ
बताओ जरा अब किधर जाऊंगा।

सितारे फलक पर न चमके अगर
लगेगा गगन कहीं खोया है क्या?
दिखेगी अगर चांदनी बेचमक
लगेगा कि चांद अभी रोया है क्या?
बेरूखी अब तुम्हारी जहर बन गयी,
दूर से ही इसे छू के मर जाऊंगा।
फूल सा मन........

गर खिले न वो तेरी हंसी का कमल
झील मन का मेरे कभी भरता नहीं
मिले न अगर सांसों की लहर
धमनियों में तरंग भी गुजरता नहीं
फेरो न नजर अब मेरी ओर से
फेरोगी जिधर मैं उधर जाऊंगा।
फूल सा मन.........

सोन किरणें भी जब छूती है मखमली
भोर मौसम सुहानी लगती नहीं
सांझ के रंग में ये मन रमता नहीं
रात में नींद आंखों में थमती नहीं
सम्हालो मुझे जुगनुओं की तरह
नहीं तो अंधेरों से डर जाऊंगा।
फूल सा मन.............
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एक घंटा पहले

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