धीमी धीमी हवाएँ संग
धीमी धीमी बदरियां
धीमी बरसात में मंद गति से
गिरती बूंदों की लड़ियाँ
जब पड़तीं हैं,
हरे कम चिकने पलाश के
लगभग समाकृति वाले
कम नरम हरे पत्तों पर, तब
मंद - मध्यम- तीव्र- ध्वनि
मिश्रित होकर बन जाती है
एक मधुर संगीत धुन
जो कर्णद्वार से प्रविष्ट हो
मन को प्रेरित कर देतीं हैं
कि जरा झूम लो, नाच लो,
गा लो, सुना लो, स्वयं को
स्वयं की चंचल कोमल और,
निर्मल प्रकृति प्रदत्त गीत,
मंद बयार में
हस्ति- सुंड - भांति
हो मतवाली झूमती ये
पलाश के पत्ते, ईशारों से
बुलाते हैं -
आओ ,जरा मेरे गीतों में
घुलकर स्वयं को मिश्री सा
बना लो,
मेरी मस्ती में थोड़ी सी
अपनी मस्ती मिला लो,
हवाओं से कहो कि-
जब तक चले, ऐसे ही चले
बूंदों से कहो कि-
अपनी निरंतरता ऐसे ही
मंद- मधुमय सजाए रहे
मुझे न थकना है,
न रूकना है,
न चुकना है,
बस, प्रकृति की इस
अनमोल समय - सृजन को
जीना है, जीना है, जीना है,
कहते हैं, ये पलाश के पत्ते।।
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