एक दिन उड़ना है तूझे, आसमान में,
पंखों को संवारो अभी, अपने मकान में!
जिस दिन तलब लगेगी तूझे, जद्दोजहद का,
थकने लगोगे बैठकर, ऐशोआराम में!
सागर में कौन जाने, कितने रत्न हैं भरे,
गोते लगाना सीख लो, आंधी तूफान में!
युद्ध के मैदान में ,जाना है वीर- सा,
रखना धार करके, तलवार म्यान में!
खामी बहुत है आज भी "समदिल" तुम्हारे में,
ठीक -ठीक झांको अपने, गिरेबान में!!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X