मुझमें एक तरफ़ है रावण, दूजे हैं श्रीराम,
साँसों के इस भँवर में, चलता है रोज़ संग्राम।
ख़्वाहिशों के दस शीश हैं, सोने की है प्यास,
मन में ही है छलकपट, अपना ही वनवास।
धुएँ में उड़ती राख सा, है वजूद-ए-इंसान,
'मैं' की जब ये लंका जले, तो जागे ईमान।
फ़क़ीर की इस राह पर, न कोई तख़्त न ताज,
रूह की ख़ामोशी, है मेरा असली अंदाज़।
मैं ही मेरा अक्स हूँ, मैं ही मेरा दंभ,
टूटेंगे जिस रोज़ ये, अहंकार के स्तंभ।
जल कर जिस पल ख़ाक होगा, 'मैं' का हर गुमान,
राख के इस ढेर से, उठेगा फिर एक इंसान।
'फ़क़ीर' सजदा वहीं करे, जहाँ मिले ये मुकाम,
रूहों की इबादत हो, और नर-नारी का सम्मान।
-मनोज भटकर
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