तुम भी प्राणी,मैं भी प्राणी।
बस स्वर मात्रा में हैं बदली मेरी तुम से वाणी।
तुम कर्कश बोल भी सब वश में कर लेते हो,
मैं सुकोमल-सी प्राण प्रिय खुद के जने बच्चों से भी
कभी-कभी नतमस्तक हो जाती हूँ!
घर-गृहस्थी के हर काज में
मैं तुम से ज्यादा अपना फर्ज हर रोज निभाती हूँ।
पर सम्पत्ति के असली मालिक बन
तुम बच्चों संग मुझ पर भी हर वक्त ही धौस जमाते हो,
मैं बच्चों की आया और तुम्हारी छाया बन
अपने सब दायित्वों का
जीवन भर नि:स्वार्थ निर्वाह करती हूँ,
मैं तो तुम्हारी हर क्षण ही परवाह करती हूँ।
पर तुम्हारी तीखी नजरों से
अक्सर धोखा ही खा जाती हूँ।
तुमने मुझें कभी भी अपने बराबर समझा ही नहीं,
मैं तो सिर्फ Use And Throw से
ज्यादा तुम्हारे लिए कभी भी रहीं नहीं।
मैंने अपनी सब आपबीती तुमसे कभी भी कहीं नहीं,
जो कहीं भी तो वह अक्सर अनकही सी ही रहीं।
तुम भी प्राणी,मैं भी प्राणी।
फिर क्यों हैं ये अंतर अधिशेष अब भी जारी।
क्यों कि
भेद ये कि
मैं जनी हूँ बन कर नारी।
- मंजू मंजुला
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