यहाँ वहाँ हर जगह
देखता हूँ जहाँ जहाँ
हर तरफ फैल रहा
काला काला सा धुआँ
साँसें हैं सिसक रहीं
सिहर रहा रूआँ रूआँ
जीने को विवश जीवन
पीछे खाई आगे कुआँ।
-मं शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X