घटने लगा है
जोश धमनियों का
लड़खड़ाने लगे हैं
पाँव हर कदम पर
फैलने लगा है
ज़हर सहानुभूतियों का
बढ़ने लगा है
बोझ नाकामियों का।
मं शर्मा (रज़ा)
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