भावनाएँ जीवंत थीं
ह्रदय मगर क्लांत था
वसंत तो अनंत थे
आकांक्षाओं का अंत था
सुख सुविधाएँ पर्यंत थीं
असंतोष आद्यान्त था
सब होकर कुछ न होने का
जीवन का षडयंत्र था ।
-मं शर्मा
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