कुछ सहमी सी, कुछ डरी- डरी सी;
है आज हमारी जिंदगी।
हर शख्स यहां खौफजदा है;
थम सी गई है जिंदगी।।
देख रौद्र रूप महामारी का;
मानव थर-थर कांप रहा है।
भ्रम टूटा दौलत- शोहरत का;
जीवन का मूल्य समझ गया है।।
शायद रूठी है प्रकृति;
या तुम रूठे दयानिधि!
मानव के ही अत्याचारों का;
मानव दुःख भोग रहा है, करुणा निधि!!
संकल्प लेते हैं, आओ मिलकर;
नहीं करेंगे धरा, खिलवाड़ कभी।
पर्वत, नदियां और वनों की;
रक्षा करेंगेे हम मां प्रकृति।।
पर्यावरण की शुद्धता को;
हम जीवन का ध्येय बनाएंगे।
स्वच्छ रखेंगेे भारत को;
"स्वच्छता" अपना अभियान बनाएंगे।।
जन- मानस की सेवा को
हम अपना कर्त्तव्य बनाएंगे।
मास्क और सामाजिक दूरी को;
हम अपने जीवन में अपनाएंगे।।
योग और शाकाहारी भोजन से;
हम स्वयं को स्वस्थ रखेंगे।
अदृश्य कोरोनावायरस;
हम तुमसे हार नहीं मानेंगे।।
धैर्य और संयम शक्ति का;
हर नागरिक पालन करेंगे।
कोरोना योद्धा की सेना;
कोरोना, तेरा संहार करेंगे।।
फिर मुस्कुरायेगा मेरा भारत;
यह स्वप्न हम देख चुके हैं।
कोरोनावायरस तू हारेगा;
यह दृढ़ संकल्प हम ले चुके हैंं।।
मंजू बिष्ट
गाजियाबाद; उत्तर प्रदेश
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