तेरे प्रेम में डूब कर हुआ है अचेतन
मेरा तन-मन
उड़ रहा है तुझ संग
भौरा बन…हर उपवन
कभी छूने हृदय तल के दबे एहसासों को
निकल पड़ता है…मत्स्य बन
पावस से प्रेम की तृष्णा लिए
धरा से तृषित...ओष्ठ बन
नींद के आकाश में इठलाता है
गोते लगाता हुआ..स्वप्नों का पंछी बन
अनुभूतियों की कश्ती लेकर
निकल पड़ता है..करता है कितने जतन
तुझसे मिलन को तेरे शहर
मेरा ये चंचल मन
हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X