आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

किसी ने हमको चाहा ही नहीं

Kisi Ne Hamko Chaha Hi Nahi
                
                                                         
                            किसी को छिछला पसंद आया
                                                                 
                            
किसी को उन्माद पसंद आया

किसी को गहरा पसंद आया
किसी तो ठहरा पसंद आया

किसी को शब रास आयी
कोई सहर पे है लुटा

किसी ने चाशनी को चुना
कोई ज़हर पे मर मिटा

किसी ने समझा नही
कोई समझना चाहा नही

किसी को हमने चाहा
किसी ने हमको चाहा ही नही

- मनीष यादव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर