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ग़ज़ल - हिंदी में

                
                                                         
                            संजोए हैं मेरे पुरखों ने जो जज़्बात हिंदी में ;
                                                                 
                            
सदा महका करेंगे बनके वो सौग़ात हिंदी में।

मुझे लगता है जैसे इसमें सातों सुर समाये हों;
ग़ज़ल के लहजे में करता हूँ जब भी बात हिंदी में।

मैं हिंदी की हिमायत के लिए किस दर पे जाऊँ अब;
अदालत भी नहीं सुनती मेरे हालात हिंदी में।

वतन की तरह ही भाषा हमारी ख़ूबसूरत है;
जहाँ होगा वतन का ज़िक्र, होगी बात हिंदी में।

यूँ ही गुणगान मैं करता रहूँ माँ भारती तेरा;
विचारों की सदा होती रहे बरसात हिंदी में।

ज़माना आज भी क़ायल है ग़ज़लों का मेरी 'मोहक';
ज़माना कल भी गाएगा मेरे नग़्मात हिंदी में।
-मनीष 'मोहक' 
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4 घंटे पहले

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